सतलुज विवाद: ट्रुथ कमीशन क्या होता है और पंजाब में इसकी मांग क्यों उठ रही है?
फिल्म "सतलुज" को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद पंजाब में एक बार फिर "ट्रुथ कमीशन" (सत्य आयोग) बनाने की मांग तेज हो गई है। यह बहस इस बात पर है कि 1981 से 1995 के बीच पंजाब में उग्रवाद के दौर में आखिर कितने लोगों की मौत हुई और उनकी सही गिनती क्या है।
इस मांग का समर्थन कई राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने किया है। इनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा भी शामिल हैं। जसवंत सिंह खालड़ा ने उस समय कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों और लापता लोगों के मामलों को उजागर किया था। 1995 में पुलिस हिरासत के दौरान उनकी हत्या कर दी गई थी। उनकी जिंदगी पर ही फिल्म सतलुज आधारित है।
केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने भी आयोग बनाने की मांग का समर्थन किया है। हालांकि उन्होंने कहा कि आयोग केवल कथित फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की ही नहीं, बल्कि आतंकवादियों द्वारा मारे गए पुलिसकर्मियों, आम नागरिकों, हिंदुओं और अन्य सभी पीड़ितों की मौतों का भी पूरा रिकॉर्ड तैयार करे।
ट्रुथ कमीशन क्या होता है?
ट्रुथ कमीशन या ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन एक अस्थायी सरकारी आयोग होता है। इसका काम किसी देश या राज्य में हुए मानवाधिकार उल्लंघन, युद्ध अपराध या सरकारी अत्याचारों की जांच करना और सच्चाई सामने लाना होता है।
यह आयोग अदालत की तरह काम नहीं करता। इसके पास किसी को सजा देने का अधिकार नहीं होता। इसका मुख्य उद्देश्य पीड़ितों के बयान दर्ज करना, घटनाओं की जांच करना और एक आधिकारिक रिपोर्ट तैयार करना होता है, ताकि भविष्य के लिए सही रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।
मानवाधिकार विशेषज्ञ प्रिसिला बी. हेयनर के अनुसार, ट्रुथ कमीशन की मुख्य विशेषताएं हैं—
यह पुराने मामलों की जांच करता है।
लंबे समय तक हुई घटनाओं का अध्ययन करता है।
पीड़ितों और प्रभावित लोगों से सीधे बातचीत करता है।
यह एक निश्चित समय के लिए बनाया जाता है।
इसे सरकार की आधिकारिक मंजूरी प्राप्त होती है।
भारत में क्या कभी ट्रुथ कमीशन बना है?
अब तक भारत में न तो केंद्र सरकार और न ही किसी राज्य सरकार ने ट्रुथ कमीशन बनाया है।
हालांकि कई घटनाओं के लिए इसकी मांग उठती रही है, जैसे—
देश का विभाजन (Partition)
1984 के सिख विरोधी दंगे
कश्मीरी पंडितों का पलायन
2002 के गुजरात दंगे
साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय कौल ने भी जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन बनाने की सिफारिश की थी।
पंजाब में इसकी मांग क्यों हो रही है?
1998 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस कुलदीप सिंह की पहल पर एक गैर-सरकारी पीपुल्स कमीशन फॉर ह्यूमन राइट्स वायलेशन इन पंजाब बनाया गया था। इसका उद्देश्य कथित फर्जी मुठभेड़ों और मानवाधिकार उल्लंघनों के पीड़ित परिवारों के बयान दर्ज करना था।
अब फिल्म सतलुज के बाद यह बहस फिर शुरू हो गई है।
एक पक्ष का कहना है कि उग्रवाद के दौर में पंजाब पुलिस ने हजारों लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मार दिया और कई शवों का गुप्त रूप से अंतिम संस्कार कर दिया।
दूसरी ओर कुछ लोग कहते हैं कि आतंकवादियों ने भी हजारों निर्दोष नागरिकों, पुलिसकर्मियों, सुरक्षाबलों, हिंदुओं और नेताओं की हत्या की थी। दोनों पक्ष अलग-अलग आंकड़े बताते हैं, लेकिन इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
जसवंत सिंह खालड़ा का दावा
जसवंत सिंह खालड़ा और बाद में उनकी पत्नी परमजीत कौर खालड़ा का दावा रहा है कि उग्रवाद के दौरान करीब 25,000 लोग या तो लापता हो गए या उनके शवों का "अज्ञात" बताकर अंतिम संस्कार कर दिया गया।
उन्होंने केवल अमृतसर जिले में 2,097 ऐसे मामलों का रिकॉर्ड पेश किया था। बाद में सीबीआई जांच में इन मामलों की पुष्टि हुई।
रवनीत सिंह बिट्टू की राय
रवनीत सिंह बिट्टू, जिनके दादा और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की 1995 में खालिस्तानी आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी, इस आंकड़े पर सवाल उठाते हैं।
उनका कहना है कि यदि कोई आयोग बने तो उसमें केवल पुलिस कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आतंकवादियों द्वारा मारे गए सभी लोगों का भी पूरा रिकॉर्ड शामिल होना चाहिए।
ट्रुथ कमीशन से क्या फायदा होगा?
वरिष्ठ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता एच.एस. फूलका का मानना है कि पंजाब में हिंसा कई पक्षों से हुई थी। आतंकवादियों ने भी निर्दोष लोगों की हत्या की और पुलिस पर भी फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोष युवकों को मारने के आरोप लगे।
उनके अनुसार ट्रुथ कमीशन का उद्देश्य किसी से बदला लेना नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई सामने लाना और इतिहास का सही रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उन काले दिनों की वास्तविकता जान सकें।
उन्होंने कहा कि आयोग का मकसद पुराने घावों को फिर से खोलना नहीं, बल्कि समाज को सच के आधार पर आगे बढ़ने और आपसी विश्वास बहाल करने में मदद करना होना चाहिए।
दुनिया के अन्य देशों में ट्रुथ कमीशन
अब तक दुनिया के 70 से अधिक देशों में ट्रुथ कमीशन या इसी तरह के आयोग बनाए जा चुके हैं।
दक्षिण अफ्रीका में 1995 में राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने रंगभेद (अपार्थाइड) के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन बनाया था।
कनाडा ने 2008 में आदिवासी बच्चों के साथ हुए अत्याचारों की जांच के लिए ट्रुथ एंड रिकंसिलिएशन कमीशन का गठन किया था।
इन आयोगों का उद्देश्य केवल सच्चाई सामने लाना नहीं था, बल्कि समाज में मेल-मिलाप और विश्वास बहाल करना भी था।
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